
सफ़र लंबा था…
रेगिस्तान की तपती रेत, तेज़ हवाएँ और थके हुए मुसाफ़िर।
उन यात्रियों के बीच एक शांत चेहरा भी था —Guru Nanak
।
वे पश्चिम की ओर जा रहे थे, उस पवित्र धरती की तरफ़ जिसे मुसलमान खुदा का घर मानते थे —Macca ।
दिनभर की यात्रा के बाद रात हुई।
थके हुए यात्री मस्जिद में आराम करने लगे।
गुरु नानक देव जी भी वहीं एक कोने में लेट गए।
थकान इतनी थी कि उन्हें गहरी नींद आ गई।
लेकिन तभी…
एक गुस्से से भरी आवाज़ गूँजी —
“उठो!”
गुरु नानक देव जी ने धीरे से आँखें खोलीं।
सामने एक मुल्ला खड़ा था। उसकी आँखों में क्रोध था।
“क्या तुम्हें धर्म की ज़रा भी इज़्ज़त नहीं?”
वह चीखा।
“तुमने अपने पैर मक्का की तरफ़ कैसे कर दिए? यह खुदा का घर है!”
आसपास बैठे लोग भी डर गए।
पूरा माहौल तनाव से भर गया।
लेकिन गुरु नानक देव जी के चेहरे पर ज़रा भी भय नहीं था।
उन्होंने मुस्कुराकर बहुत शांत स्वर में कहा —
“अगर मुझसे गलती हुई है, तो कृपया मेरे पैर उस दिशा में कर दीजिए…
जहाँ भगवान न हो।”
एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
मुल्ला चौंक गया।
उसने सोचा यह व्यक्ति मज़ाक कर रहा है।
वह बोला,
“तुम नहीं जानते? हर इंसान को मक्का की ओर मुँह करके इबादत करनी चाहिए।
यहाँ तक कि मरने के बाद भी लोगों को मक्का की तरफ़ चेहरा करके दफनाया जाता है।”
गुरु नानक देव जी ने शांत आँखों से उसकी ओर देखा और बोले —
“परमात्मा तो हर जगह है।
तुम्हारी अपनी पवित्र किताब कुरान भी कहती है —
‘तुम जिधर भी रुख करो, उधर ही अल्लाह का चेहरा है।’”
ये शब्द सुनते ही…
मुल्ला की आँखों का गुस्सा धीरे-धीरे पिघलने लगा।
उसका सिर झुक गया।
उसे एहसास हुआ कि वह जिस खुदा को सिर्फ़ एक दिशा में ढूँढ रहा था…
वह तो हर कण में मौजूद है।
अगले ही पल वह गुरु नानक देव जी के चरणों में गिर पड़ा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“मुझे माफ़ कर दीजिए,” उसने काँपती आवाज़ में कहा,
“आज आपने मुझे असली इबादत का मतलब समझाया है।”
उस रात मस्जिद में सिर्फ़ एक इंसान नहीं बदला था…
बल्कि कई दिलों के अंदर बैठी नफ़रत की दीवार टूट गई थी।
क्योंकि सच्चा धर्म दिशा में नहीं…
दृष्टि में होता है।
